Monday, August 16, 2010

दीनदयाल शर्मा / डुक -7 , 8

डुक - 7


शिक्षक दिवस नै गुरजी रो,

छोरां यूं करयो सनमान,

कै इण दिन कणी छोरै,

बां'रो नीं करयो अपमान.


डुक - 8


सुख रा सागर सूख ज्यावै ,

जंजाळ जीव रा जाणो,

धन घटे अर पत घटावै,

कोट कचेड़ी थाणो.

Tuesday, August 10, 2010

दीनदयाल शर्मा / डुक - 4, 5, 6


डुक - 4

डुक है मेरो निन्हो सो,
अर च्यार लेण रो आगियो,
सूत्या हो तो भाया आनै,
पढण खातर जागियो.

डुक -5

धरम है मेरो मिनखपणों,
अर भासा राजस्थानी,
डुक लिख्या है थारै खातर,
डुक मेरी निसानी.

डुक -6

देखो आपरी ड्युटी नै,
कियां करै बै कैस,
मैडम बणावै स्वेटरां,
अर टीचर खेलै चैस.

Friday, August 6, 2010

दीनदयाल शर्मा / डुक - 3

डुक - 3


इनाम नै सिलाम करां,

बार बार झुक,

इनाम तो इनाम होवै,

मिलै भलांई डुक.

Thursday, August 5, 2010

दीनदयाल शर्मा / डुक - 2



डुक - 2


नान्हे नान्हे टाबरियां रै,

मुंडै पडै ल्याळ,

चा नै चियर्स कह र पीवै,

पाछे काडै गाळ.

Wednesday, July 28, 2010

दीनदयाल शर्मा : डुक - 1


डुक - 1

च्यार साल रो छोरो है,
स्कूल कोनी जावै,
पण टी वी आल़ा विज्ञापन,
मुख जबानी आवै.

दीनदयाल शर्मा

Monday, July 19, 2010

दीनदयाल शर्मा की हास्य कविता / धापी



धापी
बोदियै बजार में
खड़ी बूढळी धापी
प्रौढ शिक्षा में
जावै ही पढण
ले'र कापी।

ताजा होयोड़ी ही
बरसात
तिसळगी हातोहात,
इत्ती दूर गई कापी
कै
नापणियै ईं नापी।

सा'मै स्यूं आयौ डैण
मिला नैण स्यूं नैण
कन्नै आयौ टुळक'र
फेर बोल्यौ मुळक'र
लै' पकड़ प्रिय कापी
अर देखती रै'गी धापी।


बा' सोचण लागी
मन में
अर झुरझरी छुट्टी
तन में....
कै भरी जुवानी नीं
पट्यौ कोई पापी
अर बुढापै में
राममारयो
पटग्यौ आपी।

Wednesday, July 14, 2010

राजस्थानी लघु कथावां / दीनदयाल शर्मा




अंतस री पीड़

दरखत री उदासी देख'र बेलड़ी पूछ्यौ-'आज थे इत्ता उदास क्यूं हो?'

दरखत बोल्यौ-'आपणै पाड़ोसी रौ छोरौ भी लीक्खण लाग ग्यौ।'

'तो इण में उदास होण री कांईं बात है। थानै तो राजी होवणौ चाइजै।' बेलड़ी आंख्यां मटकांवती बोली।

दरखत लाम्बी सांस ले'र कैयौ-'दु:ख तो इण बात रौ है कै औ' भी आप रै बापू दांईं कचरौ'इज लिखै।'

'थारौ के ल्यै। थारै भाऊं चोखौ लिखै चायै कचरौ।' बेलड़ी हाथ हलांवती बोली।

'बावळी तन्नै पतौ नीं है। अंतस री पीड़ कुण जाणै। तन्नै ठा' होवणौ चाइजै कै जद पोथ्यां छपै तो म्हांनै बलिदान देवणौ पड़ै।' दरखत लाम्बी सांस छोड़तां थकां कैयौ।

आशीर्वाद

'बेटा, रोटी देसी के? दो दिनां स्यूं भूखी हूँ ।' अस्सी बरसां री डोकरी एक घर रै बारै खड़ी लुगाई स्यूं हाथ पसार'र कैयौ।

'आगै चाल। राममार्या मंगता इत्ता होग्या कै सांस ई को लेण द्यै नीं।' मुंडौ बिचकांवती लुगाई बोली। डोकरी आसीस देवतां थकां कैयौ-अच्छ्या बेटा, भगवान तन्नै सुखी राखै।



व्यंग्य कविता - रफ़्तार / दीनदयाल शर्मा

रफ़्तार

बै'

गया

रफ़्तार में

अर

आया

अखबार में .

- दीनदयाल शर्मा