Sunday, June 19, 2011

गा / दीनदयाल शर्मा


गा / दीनदयाल शर्मा

पीण नै
दूध-छा
खाण नै
दही - घी- मक्खण
बाळन-लीपण नै
गोबर
अर खेत सारू
खात देवै ।

मिनख
इण रा
हाड-चाम भी
काम लेवै ।

मिनखां सारू
आपरौ
आ' कण-कण
अरपित करद्यै
आ' गा है
कै
आ' मा है ।


Thursday, March 31, 2011

राजस्थानी सबद - भाग : 1/ दीनदयाल शर्मा


राजस्थानी सबद - भाग : 1/ दीनदयाल शर्मा

प्रतियोगी परीक्षा रै पढेसरियां सारू गांवां रा आंचलिक सबद देर्यौ हंू। चोखा लागै तो टिप्पणी जरूर कर्या।
1. न्याणां= गाय का दूध दूहते समय उसके पीछे वाले पैरों में क्रॉस की तरह जो रस्सी बांधते हैं।
2. जावण= दूध को दही रूप में जमाने के लिए हल्के गर्म दूध में चम्मच भर दही या छाछ डालते हैं। इसी दही या छाछ को जावण बोलते हैं।
3. सुण्डी= नाभि
4. पीळा पोमचा= एक ऐसी ओढऩी, जिसे केवल पुत्र की मां ही ओढ़ती है।
5. दावण= चारपाई के लगभग पांचवें हिस्से में लगाई गई रस्सी को जो सूत, रबड़ या कपड़े की बनी होती है।
6. नेत्रो= दही बिलोते समय जो रस्सी काम में ली जाती है।
7. डोई= कुड़छे के समान लकड़ी के बने हुए यंत्र को डोई कहते हैं।
8. झेरना= दही बिलौने के लिए लकड़ी का यंत्र जिसमें नीचे की ओर उसी लकड़ी से चार हिस्से करके बना होता है। छिले हुए केले के छिलकों की तरह बना होता है।
9. थेपड़ी= गोबर से बनाई गई चपटी गोलाकार आकृति जो पुरानी गली-सड़ी तूड़ी या ग्वार का सूखा बेकार चारा मिलाकर बनाई जाती है।
10. छाणां= गोबर से बिना कोई आकार के बने छोटे-छोटे उपले।
11. ठाण= पशुओं को चारा डालने के लिए बनाया गया स्थान।
12. साळ या कोठा= घर के अंदर आंगन में बना आयताकार बड़ा कमरा।
13. सुरमा= जो सूखा होता है और आंखों की सफाई के लिए आंखों में डाला जाता है।
14. काजळ= आंखों की सुन्दरता के लिए महिलाएं लगाती हैं।
15. निजरियो= बच्चों के माथे के एक ओर लगाया जाने वाला काजल का टिक्का।
16. बाखळ= आंगन के बाहर से लेकर मुख्य द्वार के बीच की जगह।
17. दुराजौ= दरवाजा
18. कंध या भींत= दीवार
19. मौ'डा= भुजा
20. गौडा= घुटना
21. बींटी= अंगूठी
22. लीख= जूं की पूर्वावस्था।
23. ढेरा या टोकळ= जूं का बड़ा रूप।
24. डोळा= भौंहें
25. भांपण= आंखों के ऊपर के बाल।
26. गुद्दी= गर्दन के पीछे का हिस्सा।
27. कमर या कड़= पीठ
28. फींच = घुटने के पीछे का हिस्सा।
29. पींडी= घुटने और टखने के बीच का हिस्सा।
30. साथळ=घुटने और कमर के बीच का हिस्सा।

जोकर / दीनदयाल शर्मा


जोकर

इसके बिना रहे सर्कस सूना
दर्शक एक ना आए
उल्टे-सीधे पहन के कपड़े
करतब यह दिखलाए।

गिरते-गिरते बच जाता यह
पल-पल में इतराए
गुमसुम कभी न देखा इसको
हर पल यह मुस्काए।

भीतर ही भीतर खुद रोता
जग को खूब हँसाए
इसको कौन हँसाएगा, यह
मन ही मन ललचाए।

मन मर्जी का मालिक है ये
"जो कर" यह कहलाए
बच्चा बूढ़ा नर और नारी
सबके मन को भाए।।


Thursday, December 23, 2010

मां तूं घणी महान / दीनदयाल शर्मा


मां तूं घणी महान


दुनिया दिखाई म्हानै

माणस बणाया म्हानै

गीलै में खुद तूं सोई

सूकै सुयाया म्हानै

जग में बणाई स्यान

मां तूं घणी महान।।


तेरी थां न कोई लेवै

भगवान भी है छोटौ

तेरौ हाथ म्हारै सिर पर

कियां पड़ैगौ टोटौ

जीवण दियौ तूं दान

मां तूं घणी महान।।


चरणां में तेरै अरपित

जीवण सदा मैं करस्यूं

करजाऊ सदांई रै'स्यूं

करजौ कियां मैं भरस्यूं

दिन-रात तेरौ ध्यान

मां तूं घणी महान।।


-दीनदयाल शर्मा,

बाल साहित्यकार,

हनुमानगढ़, राजस्थान

मोबाइल : 09414514666


Saturday, December 18, 2010

संस्मरण : बाळपणै री बातां / दीनदयाल शर्मा


औ के सांग कर राख्यौ है रै...?

म्हूं तीसरी मे पढतौ जद री बात है। गरम्यां रा दिन हा। इस्कूल में आधी छुट्टी होंवतांईं म्हूं रोटी खाण सारू भाज्यौ-भाज्यौ घरां आयौ। भाजण रै कारण मौसम रै मुजब डील माथै पसीनौ आ ग्यौ। म्हूं आपरौ कुड़तियौ उतार'र मांची माथै नाख दियौ अर तावळै-तावळै रोटी खावण लागग्यौ कै कठैई मोड़ौ ना हुज्यै। घरां भाभी ही। भाईजी रौ नूंवौ- नूंवौ ब्याव होयोड़ौ हो। भाभी गाभा धोंवती-धोंवती मे'रलौ कुड़तियौ केठा कद मां'कर लेयगी। म्हूं रोटड़ी खांवतांईं कुड़तियौ ढंूड्यौ। इन्नै-बीन्नै देखंू-पंूछूं .....कदी किन्नैई तो कदी किन्नैई...। मन्नै दुळमच सी आण लाग्गी......म्हूं झुंझळांवतौ सो बोल्यौ.....अरै मेरौ कुड़तियौ किन्नै गयौ.....अबै तांईं खोल'र मांची माथै नाख्यौ हो.......मन्नै इस्कूल नै मोड़ौ होवण लागर्यौ है.......।
जदी कोई बोल्यौ, 'तेरी भाभी नै पूछ दिखाण.....।'
म्हूं भाज्यौ-भाज्यौ भाभी कन्नै जा'र पूछ्यौ, 'भाभी मेरौ कुड़तियौ देख्यौ के?'
बौ है के?.....तणी कानी हात करतां थकां भाभी बोली।
म्हूं देख्यौ कै कुड़तियौ तो तणी माथै सूकण लागर्यौ है.....।
मन्नै रीस भी आई .....पण नंूवीं-नंूवीं आयोड़ी भाभी नै के कैवंू!
मेरौ चे'रौ पढ'र भाभी मुळकती सी बोली, कोई और पै'र ज्यावौ। इत्तौ कै'र बा तो आपरै काम लागगी।
अबै बींनै म्हूं के केऊं......दूजौ कोई चज रौ कुड़तियौ को'इनी.... जिकौ इस्कूल पै'र चल्यौ जाऊं। अेक कानी कुड़तियै आळी परेस्यानी अर दूजै पासै गुरज्यां री मार रौ डर। कोई टाबर बिना मतलब इस्कूल स्यूं घरे रैज्यांवतौ तो बै' बीं'री झाम कस देंता...कूट-कूट'र मंूज बणा देंता..।
म्हूं बांरी मार स्यूं डरतौ उघाड़ौई चाल पड़्यौ इस्कूल कानी। इस्कूल में बड़तांईं गुरजी री निजर मेरै माथै पड़ी। बै' मन्नै देखतांईं थोड़ा रीसां में बोल्या, अरै कुण...सीरीराम..।
'हां जी।'
'हां जी रा बच्चा....औ के सांग कर राख्यौ है रै...?'
गुरजी, कुड़तियौ तो मेरी भाभी धो दियौ जी.....। म्हूं सोच्यौ कै इस्कूल नीं गयौ तो गुरजी मारैगा.....इण कारण म्हूं उघाड़ौई आ ग्यौ जी।
बै' रीसां में धमकांतां बोल्या, जा.....गीलौई पैरिया.....। सरम कोनी आवै...इस्कूल में र्इंयांईं आ ग्यौ......।
म्हूं मन ई मन बोल्यौ, ईंयांईं कठै आ ग्यौ, पैंट तो पै'र राखी है... पण बानै बोल'र कैणै री हिम्मत नीं होई।
खड़्यौ-खड़्यौ के सोचै...जा गीलौई पैरिया जा...। बां' रीसां में कैयौ।
अर म्हूं कुड़तियौ लेण नै घर कानी भाज्यौ......।
रस्तै में कदी गुरजी माथै रीस आवैई तो कदी भाभी पर...... घरां आयौ......तणी स्यूं कुड़तियौ उतार'र पै'रण लाग्यौ तो भाभी बोली, सीरीराम जी.....ईंयां के करो......! कुड़तियौ गील्लौ है नीं.......!
गील्लौ तो मन्नैई दीखै........म्हूं कुड़तियौ पैरतौ - पैरतौ बोल्यौ, और के करूं तो...!
भाभी मेरै कन्नै आ'र बोली, ल्यावौ मन्नै द्यौ.......चूल्है री आंच में थोड़ौ सुकाद्यंू।
रैणदे भाभी मन्नै मोड़ौ होवै..। म्हूं कुड़तियौ आखरी बटण बंद करतौ बोल्यौ।
ईंयां के करौ....... गील्लौई पै'र लियौ...! गुरजी मारैगा कोनी के...? म्हूं चूल्है री आंच में चटकैसी सुका देस्यूं । इत्तौ कै'र भाभी मेरौ कुड़तियौ खोलण लागगी.......। म्हूं पत्थर री मूर्ति दांईं खड़्यौ रैयौ .....चुपचाप..। भाभी कुड़तियौ खोल'र चूल्है कानी लेयगी। म्हूं भी बींरै साथै-साथै ई.....।
चटकौ कर भाभी मोड़ौ होवै नीं.......!
बस दो मिण्ट.....। कै'र भाभी कुड़तियै नै चूल्है री आंच में सुकाण लागगी।
अर म्हूं तावळै - मोड़ै रै चक्कर में फंूकणी ले'र चूल्है में फंूक मारण लागग्यौ। म्हूं सोच्यौ कै चूल्हौ ढंग स्यूं जग ज्यै तो कुड़तियौ चटकै सूक ज्यै। चाणचकौई चूल्हौ हबड़ दणी सी जग्यौ.......। अर कुड़तियै री अेक बाजू रबड़ दांईं भेळी होयगी.....। आ' देख'र भाभी धोळी होयगी.......अर म्हूं भी देखतोई रै'ग्यौ।
भाभी कदी मुळकै.......अर कदी अफसोस करै.....। बा'बोली, चूल्है में फंूक नीं मारता तो औ कुड़तियौ ईंयां कोनी होंवतौ......।
तो अबै .....के पै'र जाऊं मैं?
कुड़तियै नै चोखी तरियां खोल'र देखतां थकां भाभी बोली, अेक इलाज हो सकै.....। देखंू दिखाण..। इत्तौ कै'र भाभी साळ कानी चाल पड़ी।
म्हूं चुपचाप बींरै लारै-लारै.....। मन्नै दुळमच सी आण लागगी। म्हूं बोल्यौ, भाभी, मन्नै मोड़ौ होण लागर्यौ है नीं...!
अेक मिण्ट रुकौ.....।
अर बण कतरणी ले'र कुड़तियै री दोनूं बाजुआं नै आधी-आधी काट'र बराबर-बराबर कर दी। पछै मन्नै कुड़तियौ पकड़ांवती बोली, अबै ठीक है नी......?
म्हूं के कैवै हो.....। फटाईफट गळ में कुड़तियौ घाल'र भाज पड़्यौ इस्कूल कानी......। कै कठैई मोड़ौ होग्यौ तो गुरजी लत्ता ले ल्यैगा.....।

बाळपणै री बातां
दीनदयाल शर्मा

Baalpane Ri Baatan in News Paper Taabar Toli


Taabar Toli 16 - 31 December 2010